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MY POETRY
SAWAAL " मन्ज़िल है दूर किनारा भी नही है, लेकिन किनारे का न होना ही शायद सही है... थक के ग़र बैठे तो सदियाँ गुज़र जाएंगी मन्ज़िल हमारी राहों से और दूर निकल जाएगी, राहें आसान होंगी जो तुम साथ दोगे... हाथों मे मेरे तुम जो अपना हाथ दोगे, मेरी मन्ज़िल भी तुमसे है और सफ़र भी, क्या संभलने के लिए तुम अपना हाथ दोगे ? मेरे हमसफ़र बनकर क्या मेरा साथ दोगे ?" -SHWETA
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