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Wednesday 20 August, 2008
 15:34 | 9/Jul/2008 |  8 Comment(s)
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my poetry

      "आवाज़"

 

ढलते सूरज की रोशनी के पार
जैसे कोई बुला रहा है मुझे
पर कहीं कोई निशां नहीं
कहीं कोई आहट नहीं
जाने क्यूँ खिच जाती हूँ मैं,
कदम... क्यूँ बढ़ते हैं उस आवाज़ की ओर
पर चलते-चलते ठिठक जाते हैं पाँव
ना आगे का रास्ता मिलता है
ना उस आवाज़ का कोई सुराग...
उस आवाज़ का दर्द झकझोर देता है मुझे,
ऐसा लगता है कोई छूट रहा हो मुझसे
कोई दूर हो रहा हो मुझसे
और... डूबते सूरज के साथ
वह आवाज़ भी क्षितिज में डूब जाती है
और मैं.........
खड़ी रह जाती हूँ अंधेरे में
निस्तब्ध................ और अकेली
सुकून और व्याकुलता के द्वंद के साथ
लौट पड़ती हूँ अपने बसेरे की ओर
मन में हलचल लिए..........
कौन है ?
क्या कहना चाहता है ?
क्यूँ उसका दर्द मुझे सालता है ?
मुझे इंतज़ार है अगले दिन सूरज डूबने का,
क्यूँकि... मैं पहचानना चाहती हूँ उस आवाज़ को,
समझना चाहती हूँ उसकी अनकही बातों को,
बाँटना चाहती हूँ उसके दर्द को,
मिटाना चाहती हूँ अपने अंतर्द्वंद को,
इसलिए, इंतज़ार है मुझे........
ढलते सूरज का.....
उस आवाज़ का.......

                       -shweta

Category: Poetry | Permalink