"वक़्त"
किस्से कई हैं...
यादें कई हैं...
किस-किस को बयां करूँ,
किस लावे को पिघला कर ओस बनाऊँ,
किस शबनम पे आग का कतरा रखूँ...
... जो एहसास कल साथ चल रहे थे,
वे आज ज़हन में घर बना चुके हैं,
कैसे भूल जाऊँ उस वक़्त को......
जो कल मेरा हमसफ़र था
और.......
आज मेरा गवाह......
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